मोक्षार्थी के जीवन में परमात्मा और सद्गुरु की भक्ति आवश्यक: जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी

Vikram B Rathod
पिण्डवाड़ा, 27 अगस्त 2026। प्रभावक प्रवचनकार जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. ने पिण्डवाड़ा स्थित श्री प्रेमसूरि गुरु मंदिर आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने के लिए परमात्मा और सद्गुरु, दोनों का आलंबन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रथ को चलाने के लिए दो पहियों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना के लिए देव और गुरु दोनों के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
जैनाचार्य ने देव और गुरु की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा कि देव अर्थात राग-द्वेष से रहित, वीतराग और सर्वज्ञ परमात्मा तथा गुरु अर्थात पाप कार्यों का त्याग करने वाले और परमात्मा द्वारा बताए गए मोक्षमार्ग को यथावत बताने वाले साधु भगवंत हैं। प्रत्येक मोक्षार्थी के जीवन में परमात्मा के साथ सद्गुरु की भक्ति भी आवश्यक है। केवल परमात्मा की भक्ति अथवा केवल गुरु की भक्ति से मोक्षमार्ग में पूर्ण रूप से आगे बढ़ना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि अपेक्षाकृत परमात्मा की भक्ति की तुलना में सद्गुरु की भक्ति अधिक कठिन है। परमात्मा मौन रहते हैं, इसलिए वे हमारी भूलों को प्रत्यक्ष रूप से बताकर सुधार नहीं सकते, जबकि सद्गुरु हमारी भूलों को बताते हैं और उन्हें सुधारने का मार्ग भी दिखाते हैं। सद्गुरु ही अज्ञान के अंधकार में लिप्त आत्मा को ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का कार्य करते हैं।
जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी ने कहा कि तीर्थंकरों के विरह में संसार के जीवों को मोक्षमार्ग का यथार्थ मार्गदर्शन देने का कार्य सद्गुरु करते हैं। वे निःस्पृही भाव से साधना करते हुए स्वयं भवसागर से पार उतरने का प्रयास करते हैं और अन्य जीवों को भी मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

सद्गुरु की निःस्वार्थ भावना का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सांसारिक जीवन में किसी कानूनी मामले में वकील की छोटी-सी सलाह के लिए भी हजारों रुपये देने पड़ सकते हैं। इसी प्रकार बीमारी के निदान और उपचार के लिए डॉक्टर या वैद्य की फीस देनी पड़ती है। लेकिन जो सद्गुरु जीवों को मोक्ष का मार्ग बताते हैं, वे इसके बदले किसी प्रकार का धन नहीं लेते। उनका उद्देश्य जीवों का कल्याण और आत्मा को मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करना होता है।
धर्मसभा में जैनाचार्य ने श्रद्धालुओं को परमात्मा के प्रति भक्ति के साथ सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलने, अपनी भूलों को पहचानने और आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ने का संदेश दिया।
इस अवसर पर आगामी 1 सितंबर को तप एवं तपस्वी वंदना का भक्तिमय एवं संगीतमय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह का वातावरण है।











