सुमेरपुर डिस्कॉम की लापरवाही से गौशाला अंधेरे में, गौवंश प्यास से बेहाल… और सिस्टम गायब!
जला ट्रांसफार्मर हटाने तक नहीं पहुंचा बिजली विभाग, भयंकर बीमारी से जूझ रहे पत्रकार और ट्रैक्टर चालक ने संभाला मोर्चा

सुमेरपुर, पुखराज कुमावत।
क्या राजस्थान में अब सरकारी विभागों का काम भी आम जनता को ही करना पड़ेगा? क्या गौशालाओं में रहने वाले बेजुबान पशुओं की जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? और क्या करोड़ों रुपये खर्च करने वाली व्यवस्था इतनी लाचार हो चुकी है कि एक जला हुआ ट्रांसफार्मर हटाने तक के लिए कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचते?
सुमेरपुर की श्रीराम गौशाला कोलीवाड़ा में बुधवार को जो तस्वीर सामने आई, उसने विद्युत विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुबह ट्रांसफार्मर जलने के बाद गौशाला की बिजली व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई। भीषण गर्मी के बीच सैकड़ों गौवंश पानी के लिए तड़पते रहे, लेकिन पूरे दिन राहत पहुंचाने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा।
घंटों तक फोन घुमाता रहा गौशाला व्यवस्थापक
गौशाला व्यवस्थापक का आरोप है कि समस्या की सूचना देने के बाद भी विभागीय कर्मचारियों और अधिकारियों ने जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालनी शुरू कर दी। किसी ने पदमाराम का नंबर दिया, किसी ने मोहनलाल का नाम लिया तो किसी ने दूसरे कर्मचारी से संपर्क करने को कहा।
गौशाला व्यवस्थापक के अनुसार कई बार कार्यालय और कर्मचारियों से संपर्क किया गया, लेकिन समाधान के बजाय केवल इंतजार मिला। आरोप यह भी है कि कुछ कर्मचारियों ने साफ कह दिया कि ट्रांसफार्मर हटाना,और भरवाना उनका काम नहीं है।
प्यास से बेहाल रहे सैकड़ों गौवंश
बिजली गुल होते ही पानी की मोटरें बंद हो गईं। भीषण गर्मी में गौशाला के सैकड़ों गौवंशों के सामने पेयजल संकट खड़ा हो गया। गौसेवकों को वैकल्पिक इंतजाम करने पड़े। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था नहीं की जाती तो हालात और अधिक गंभीर हो सकते थे।
प्रदेशभर में गौसंवर्धन और गौसेवा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर गौशालाओं की ऐसी स्थिति कई सवाल छोड़ रही है।

जब विभाग नहीं आया तो पत्रकार और ट्रैक्टर चालक ने उठाया 300 किलो का बोझ
मामला तब और गंभीर हो गया जब जले हुए ट्रांसफार्मर को हटाने की जरूरत पड़ी। गौशाला व्यवस्थापक का आरोप है कि विभाग की ओर से न तो कोई वाहन भेजा गया और न ही कोई तकनीकी टीम तथा नहीं भराने की व्यवस्था की गई। आखिरकार मौत से जंग लड़ रहे असाध्य बीमारी से पीड़ित पत्रकार पुखराज कुमावत और ट्रैक्टर चालक चतराराम देवासी स्वयं मैदान में उतरे। दोनों ने जोखिम उठाते हुए करीब 300 किलो वजनी ट्रांसफार्मर को ट्रॉली में रखवाने का प्रयास किया ताकि नया ट्रांसफार्मर लगाने की प्रक्रिया शुरू हो सके।
स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि इस दौरान कोई बड़ा हादसा हो जाता तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? क्या विभाग ने किसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था की थी?
कर्मचारी बोले- “यह हमारा काम नहीं”
गौशाला का ट्रैक्टर लेकर ट्रांसफॉर्मर भरने के लिए डिस्कॉम कार्यालय पहुंचे वहां 2 घंटे तक अधिकारी इधर-उधर घूमाते रहे। गौशाला व्यवस्थापक का आरोप है कि ट्रांसफार्मर को ट्रॉली में रखने के लिए कर्मचारियों से मदद मांगी गई तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह उनका काम नहीं है। वहीं कई कर्मचारी मोबाइल फोन में व्यस्त दिखाई दिए।
इतना ही नहीं, दोपहर करीब तीन बजे कुछ कार्यालयों पर ताले लटके मिले। इससे ग्रामीणों में और अधिक नाराजगी फैल गई। लोगों का कहना है कि यदि कर्मचारियों के पास मोबाइल चलाने का समय है तो आपदा की स्थिति में गौशाला की मदद करने का समय क्यों नहीं है?
जनता पूछ रही है, आखिर जिम्मेदार कौन?
ग्रामीणों और गौसेवकों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि बिजली बिल समय पर जमा कराने के लिए विभाग सख्ती दिखाता है, लेकिन संकट की घड़ी में जनता को अपने हाल पर छोड़ देता है। लोग सवाल उठा रहे हैं—
- ट्रांसफार्मर बदलना और हटाना किसकी जिम्मेदारी है?
- कर्मचारियों के मौके पर नहीं पहुंचने की जांच कौन करेगा?
- गौशाला में पानी का संकट पैदा होने पर जवाबदेह कौन है?
- यदि कोई हादसा हो जाता तो जिम्मेदारी किसकी होती?
सरकारों के दावों पर भी उठे सवाल
घटना ने राज्य और केंद्र सरकार की उन योजनाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं जिनमें गौसंरक्षण, ग्रामीण विकास और बेहतर विद्युत सेवाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि एक पंजीकृत गौशाला में घंटों तक बिजली बहाल नहीं हो पाती और ट्रांसफार्मर हटाने तक के लिए विभाग आगे नहीं आता, तो जमीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। लोगों का आरोप है कि जब किसी नेता के वहां बिजली खराब होती हैं तो पूरा सिस्टम वहां खड़े रहकर तुरंत प्रभाव से बिजली व्यवस्था बहाल हो जाती हैं। लेकिन बड़े विडंबना की बात है कि गौशाला के साथ किसान आज भी अधिकारियों की कार्य शैली से बहुत परेशान है।
अब जांच और कार्रवाई की मांग
श्रीराम गौशाला कोलीवाड़ा की यह घटना पूरे सुमेरपुर क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। ग्रामीणों, गौभक्तों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। लोग चाहते हैं कि यह पता लगाया जाए कि सूचना मिलने के बाद कौन-कौन अधिकारी और कर्मचारी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जनता विभाग का काम कब तक करती रहेगी और बेजुबान पशुओं की पीड़ा के लिए जवाबदेह कौन होगा?













