दवा खरीद में पारदर्शिता होगी तो ही मरीजों का भरोसा बचेगा, स्वास्थ्य की खरीद या ठेकेदारी का खेल?

जेठमल बी राठौड़
किसी भी नगर निगम की स्वास्थ्य व्यवस्था उसकी दवा खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और गुणवत्ता पर निर्भर करती है। यदि दवा खरीद की निविदा (टेंडर) ही ऐसे प्रावधानों से घिर जाए, जिन पर पक्षपात, सीमित प्रतिस्पर्धा और आर्थिक नुकसान की आशंका जताई जाने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।मीरा-भाईंदर महानगरपालिका की दवा, सर्जिकल सामग्री और चिकित्सा उपकरणों की निविदा को लेकर पूर्व नगरसेवक ओमप्रकाश जी. अग्रवाल (गारोडिया) ने जो आपत्तियां और सुझाव प्रस्तुत किए हैं, वे गंभीर चर्चा की मांग करते हैं।
उनका कहना है कि वर्तमान निविदा की कुछ शर्तें ऐसी हैं, जिनसे सीमित ठेकेदारों को लाभ मिलने की संभावना है, जबकि महानगरपालिका को अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।सकारात्मक पक्ष यह है कि केवल आरोप लगाने के बजाय निविदा प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक और प्रतिस्पर्धी बनाने के सुझाव भी दिए गए हैं। वास्तविक आवश्यकता के अनुसार दवाओं की सूची तैयार करना, छोटे पैक की बजाय बल्क पैकिंग खरीदकर लागत कम करना, अव्यावहारिक टर्नओवर शर्तों में संशोधन करना तथा केवल आवश्यक गुणवत्ता प्रमाणपत्रों के आधार पर पात्रता तय करना जैसे सुझाव सार्वजनिक धन की बचत और बेहतर खरीद व्यवस्था की दिशा में उपयोगी माने जा सकते हैं।लेकिन दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

प्रशासन ने यदि ये शर्तें गुणवत्ता नियंत्रण, समय पर आपूर्ति और वित्तीय जोखिम कम करने के उद्देश्य से बनाई हैं, तो उसे भी इनका स्पष्ट औचित्य सार्वजनिक करना चाहिए। बड़े टर्नओवर या अनुभव की शर्तें कई बार आपूर्ति में विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए रखी जाती हैं। ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर पूरी निविदा प्रक्रिया को संदेहास्पद मान लेना भी उचित नहीं होगा।असल सवाल किसी व्यक्ति या ठेकेदार का नहीं, बल्कि “पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी खरीद प्रणाली” का है। यदि निविदा की शर्तें वास्तव में अनावश्यक रूप से सीमित प्रतिस्पर्धा पैदा करती हैं, तो उनका पुनर्विचार होना चाहिए।
वहीं यदि सभी नियम विधिसम्मत और जनहित में बनाए गए हैं, तो प्रशासन को तथ्यों सहित जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कुलमिलाकर मीरा भायंदर मनपा के स्वास्थ्य विभाग की खरीद प्रक्रिया में एक-एक रुपये का संबंध जनता से है। यहां बचाया गया पैसा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश हो सकता है और यहां की गई एक छोटी सी लापरवाही मरीजों की जान पर भारी पड़ सकती है। इसलिए मीरा-भाईंदर महानगरपालिका को चाहिए कि वह प्राप्त आपत्तियों और सुझावों की निष्पक्ष तकनीकी समीक्षा कराए, आवश्यक संशोधन करे और पूरी निविदा प्रक्रिया को पूर्णतः पारदर्शी बनाए। जनहित का सबसे बड़ा हितैषी वही प्रशासन है, जिसकी खरीद प्रक्रिया सवालों से नहीं, बल्कि विश्वास से पहचानी जाए।











