बच्चों के आदर्श गुरु : आत्मरक्षा और चरित्र निर्माण के शिल्पी: कर्मयोगी जीवनलाल आर्य

घेवरचन्द आर्य
45 वर्षीय जीवनलाल आर्य का जन्म उदयपुर जिले की मावली तहसील के ग्राम सनवाड़ में माता मोहनी बाई की पवित्र कोख से हुआ। पिता भगवान लाल एक साधारण कृषक थे। घर की आर्थिक स्थिति सामान्य होने के कारण उन्होंने बाल्यकाल से ही खेती में पिता का हाथ बँटाते हुए शिक्षा जारी रखी। कठिन परिश्रम के बल पर उन्होंने स्नातक (बी.ए.) की उपाधि प्राप्त की और तत्पश्चात शारीरिक शिक्षा में स्नातक (बी.पी.एड.) किया।
गुरु-ऋण को नमन
जिस प्राथमिक विद्यालय से उन्होंने अक्षर-ज्ञान प्राप्त किया, उसी विद्यालय में शिक्षक बनकर उन्होंने अपना कॅरियर आरम्भ किया। वहाँ उनके साथ अध्यापक शंकर चौधरी कार्यरत थे, जो प्रखर आर्य समाजी विचारधारा के थे। शंकर जी की प्रेरणा से जीवनलाल जी आर्य समाज से जुड़े। वे आज भी कृतज्ञ भाव से कहते हैं – _”आज मैं जो कुछ भी हूँ, सब शंकर सर की कृपा से हूँ। यदि मैं आर्य समाज से न जुड़ता तो लोकोपकार के इस मार्ग पर नहीं चल पाता। यह सब देवकृपा और आर्य समाज का आशीर्वाद है। “_
आर्य वीर दल से राष्ट्र निर्माण तक
दिनांक 1 सितम्बर 1998 को, 17 वर्ष की आयु में वे आर्य समाज में प्रविष्ट हुए। प्रारम्भिक तीन वर्षों तक उन्होंने आर्य वीर दल के प्रशिक्षण शिविरों में स्वयं प्रशिक्षण प्राप्त किया। उसके पश्चात् उन्होंने स्वयं शिविर आयोजित करने का संकल्प लिया। पिछले 25 वर्षों में, प्रतिवर्ष औसतन चार शिविरों के अनुसार, उन्होंने अब तक 100 शिविरों का सफल संचालन किया है। इन शिविरों के माध्यम से अबतक 9,765 बालक- बालिकाओं को आत्मरक्षा, व्यायाम, योग एवं चरित्र निर्माण की शिक्षा दी गई है।

शिविर की अनुभूति : आत्मिक आनंद
यह पूछने पर कि शिविरों में कैसी अनुभूति होती है ? वे भाव-विभोर होकर कहते हैं – _”जब मैं किसी शिविर में बच्चों को प्रशिक्षण देने जाता हूँ तो हृदय आनंद से भर जाता है। बच्चों को प्रशिक्षण देते समय आत्मिक सुख एवं असीम शांति की अनुभूति होती है। यह कार्य नहीं, प्रभु-पूजा है।”_
आर्य जनता का सहयोग
शिविर संचालन में कोई कष्ट तो नहीं होता? इस प्रश्न पर उनका उत्तर है – _जहाँ भी शिविर आयोजित होता है, वहाँ की आर्य जनता तन-मन-धन से भरपूर सहयोग करती है। भोजन, आवास, व्यवस्था – किसी बात की कमी नहीं रहती। यह सब आर्य बन्धुओं के संस्कार हैं।
गुरुकुलीय पद्धति : पिता-पुत्र का संबंध
शिविर के दौरान बच्चों का व्यवहार कैसा रहता है?” इसके उत्तर में वे कहते हैं – _”मैं वैदिक गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली से प्रशिक्षण देता हूँ। मैं अपने शिष्यों से पुत्रवत् स्नेह करता हूँ, इसलिए बच्चे भी मुझे पितातुल्य मानकर श्रद्धा से प्रशिक्षण लेते हैं। यही कारण है कि आज तक मुझे किसी भी शिविर में एक भी उदंडी या अवज्ञाकारी बच्चा नहीं मिला। सभी आज्ञाकारी हैं, हर बात को मनोयोग से सीखते हैं।
सर्वश्रेष्ठ शिविर : पाली का अनुभव
अब तक के 100 शिविरों में आपकी दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ शिविर कौन-सा रहा? इस पर जीवनलाल जी बताते हैं – मेरी दृष्टि में जून 2026 में पाली मारवाड़ स्थित महर्षि दयानंद व्यायामशाला में आयोजित शिविर सभी शिविरों में सर्वश्रेष्ठ रहा। इसमें लगभग 120 आर्यवीर एवं वीरांगनाओं ने भाग लिया। सभी बच्चे अत्यंत अनुशासित रहे। उन्होंने पूर्ण मनोयोग से प्रशिक्षण प्राप्त किया और उसे अपने जीवन में उतारा भी है। आज भी बच्चों के फोन आते हैं, वे अपनी व्यायाम दिनचर्या के बारे में बताते हैं। यहाँ के आयोजकों का सहयोग अद्वितीय था। अभिभावकों एवं पाली की धर्मप्रेमी जनता का स्नेह और उपस्थिति भी अभूतपूर्व रही।
जीवनलाल आर्य जैसे कर्मयोगी महर्षि दयानंद के “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के स्वप्न को साकार कर रहे हैं। वे केवल आत्मरक्षा के प्रशिक्षक नहीं, अपितु चरित्र निर्माण के शिल्पी हैं। पाली का आर्य समाज ऐसे तपस्वी गुरु पर गर्व करता है।











