मोक्ष का सुख स्वाधीन और शाश्वत है: जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी ने मानव जीवन का बताया वास्तविक उद्देश्य

- पिण्डवाड़ा
Vikram B Rathod
श्री प्रेम सूरि गुरु मंदिर, पिण्डवाड़ा स्थित आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि इस चार गति रूप संसार में कहीं भी वास्तविक सुख नहीं है। सच्चा, स्वाधीन और शाश्वत सुख केवल मोक्ष में ही प्राप्त होता है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा अपने पूर्ण शुद्ध स्वरूप में स्थित रहती है, जहाँ न कर्मों का बंधन रहता है और न ही शरीर का अस्तित्व।
उन्होंने कहा कि मोक्ष का सुख शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उसकी केवल उपमा दी जा सकती है। संसार के समस्त भौतिक सुखों को एकत्रित कर उन्हें अनंत गुना बढ़ा दिया जाए, तब भी उनकी तुलना मोक्ष में स्थित सिद्धात्माओं के आंशिक सुख से नहीं की जा सकती। संसार का प्रत्येक सुख शरीर और इन्द्रियों तक सीमित है, जबकि आत्मिक सुख उससे अनंत गुना श्रेष्ठ और स्थायी है।
जैनाचार्य ने कहा कि मनुष्य इन्द्रियों के अनुकूल विषयों को सुख और प्रतिकूल परिस्थितियों को दुःख मानता है, लेकिन आत्मा का वास्तविक आनंद इन सबसे कहीं अधिक है। भौतिक सुखों की इच्छा और दुःखों से बचने की चाह में आत्मा अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रही है। अनेक जन्मों के कष्ट सहने के बाद ही यह दुर्लभ मनुष्य जन्म प्राप्त होता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे पर्वत से टूटकर निकला बेडौल पत्थर नदी में बहते-बहते चिकना और गोल हो जाता है, वैसे ही आत्मा भी अनगिनत जन्मों के अनुभवों और कष्टों के बाद इस मानव जन्म तक पहुँचती है। यदि इस जन्म में आत्मिक उन्नति का प्रयास नहीं किया गया तो पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त होना अत्यंत दुर्लभ है।
प्रवचन में उन्होंने कहा कि जैसे रेगिस्तान पार करने के लिए ऊँट ही सबसे उपयुक्त साधन होता है, उसी प्रकार मोक्ष की साधना केवल मनुष्य जन्म में ही संभव है। इसलिए केवल इन्द्रिय सुखों या धनार्जन में जीवन व्यतीत करना मानव जीवन की सफलता नहीं है। मानव जीवन की वास्तविक सफलता सदाचार, आत्मचिंतन और मोक्ष मार्ग की साधना में निहित है।
इस अवसर पर उन्होंने श्रद्धालुओं को अधिकाधिक धर्म आराधना करने का संदेश देते हुए बताया कि 9 अगस्त से त्रिदिवसीय समाधि पर्व महोत्सव का आयोजन किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के सहभागी बनने की अपेक्षा व्यक्त की गई।











