अंग्रेज जिन पवित्र जैन ग्रंथों को अपने साथ ले गए थे 106 साल बाद आखिरकार वे वापस लौट रहे हैं!

Vikram B Rathod
दियों पहले जैन आचार्यों और विद्वानों ने अपने हाथों से जो पवित्र ग्रंथ लिखे थे… जो हमारी संस्कृति, ज्ञान और अहिंसा की अमूल्य धरोहर थे…
उन्हें अंग्रेज भारत से अपने साथ ले गए थे। लेकिन अब इतिहास बदल रहा है। लंदन की प्रसिद्ध Wellcome Collection ने लगभग 2000 प्राचीन जैन पांडुलिपियाँ जैन समाज को लौटाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। ये कोई साधारण किताबें नहीं हैं… इनमें सदियों पुराने हस्तलिखित कल्पसूत्र, दुर्लभ चिकित्सा ग्रंथ, अद्भुत चित्रकारी वाले शास्त्र और जैन ज्ञान की वह विरासत शामिल है जिसे हमारे आचार्यों ने तप और साधना से सुरक्षित रखा था। बताया जाता है कि वर्ष 1919 में इन पवित्र ग्रंथों को बेहद कम कीमत पर खरीदा गया था। इनमें से कई पांडुलिपियाँ उस प्राचीन जैन मंदिर से लाई गई थीं जो आज के पाकिस्तान क्षेत्र में स्थित था।
अब सबसे बड़ी बात सुनिए… Wellcome Collection ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह अधिग्रहण “मूल मालिकों के हितों के विरुद्ध” हुआ था।
यानी पूरी दुनिया के सामने यह माना गया कि जैन समाज की यह धरोहर वास्तव में उन्हीं की थी। सैकड़ों साल पुराने वे पन्ने… जिन पर आचार्यों के हाथों की स्याही आज भी जीवित है… जो आज भी अहिंसा, संयम और आत्मज्ञान का संदेश दुनिया तक पहुँचा रहे हैं। सबसे गर्व की बात यह है कि अब इन अमूल्य ग्रंथों का संरक्षण Institute of Jainology और University of Birmingham के सहयोग से किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस महान विरासत को देख सकें।
यह सिर्फ पांडुलिपियों की वापसी नहीं है… यह जैन धर्म के ज्ञान, संस्कृति, तप और हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता के सम्मान की वापसी है। आज हर जैन को गर्व होना चाहिए कि हमारा धर्म केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि उस ज्ञान में जीवित है जिसे पूरी दुनिया आज सम्मान दे रही है। इस गौरवशाली खबर को ज्यादा से ज्यादा SHARE करें ताकि हर जैन तक यह ऐतिहासिक क्षण पहुँच सके।











