
आज एक बार फिर पुलिस की कार्यवाही मानवीय संवेदना पर भारी पड़ी, जब टोंक में यातायात पुलिस के सिपाही की संवेदनहीनता के कारण बुजुर्ग शिवजीलाल की असमय मृत्यु हो गई।
घटना पीपलू के जावली गांव की है जहां महेंद्र के पिता शिवजीलाल का बीपी अचानक बढ़ जाने से उनकी तबीयत बिगड़ गई। ऐसी हालत में महेंद्र अपने दोस्त के साथ पिताजी को मोटरसाइकिल पर बैठाकर टोंक के अस्पताल में इलाज के लिए ले जा रहा था, लेकिन रास्ते में ट्रैफिक पुलिस के सिपाही ने बिना हेलमेट एवं एक वाहन पर तीन सवारी बैठने के कारण नियमों का हवाला देकर उसे रोक लिया तथा चालान काटने लग गया।
महेंद्र के बार-बार पिताजी की गंभीर हालत का हवाला देने एवं अस्पताल ले जाने की विनती के बावजूद भी सिपाही का दिल नहीं पसीजा और वह चालान काटने पर अड़ा रहा। इस चक्कर में एक घंटे का महत्वपूर्ण समय बर्बाद हो गया और अस्पताल पहुंचते-पहुंचते शिवजीलाल की तबीयत ज्यादा खराब हो गई तथा उसे इमरजेंसी से आईसीयू में ले जाने के बावजूद डॉक्टर शिवजीलाल को नहीं बचा पाए।
मृतक के पुत्र महेंद्र का कहना है कि समय पर उसके पिता को इलाज मिल जाता तो शायद उसके पिता की जान बच जाती। महेंद्र का कहना है कि उसने पुलिसकर्मी से पिता की गंभीर हालत बताते हुए वाहन का नंबर नोट कर बाद में चालान बनाने का अनुरोध किया था, लेकिन सिपाही ने उसकी बात नहीं सुनी। ऐसी हालत में पिता शिवजीलाल की तबीयत बिगड़ती गई और देर से अस्पताल ले जाने के कारण डॉक्टर शिवजीलाल को बचा नहीं पाए।
इस घटना ने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया। एक बेटा अपने पिता को अस्पताल ले जा रहा था। समय कम था, धड़कनें तेज थी लेकिन ट्रैफिक पुलिस ने उसे रोक लिया – नियमों के लिए। नतीजा? पिता की जान चली गई। ये खबर सिर्फ एक खबर नहीं है। ये हमारे सिस्टम, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी इंसानियत की परीक्षा की घड़ी है।
यह घटना बताती है कि सरकार के लाख प्रयास के बावजूद आज भी पुलिस की कार्यप्रणाली वर्षों से चले आ रहे ढर्रे पर ही चल रही है, जिसमें संवेदनशीलता और मानवीय पक्ष का अभाव नजर आता है।
जहां तक ट्रैफिक पुलिस के सिपाही का सवाल है, वह अपनी ड्यूटी कर रहा था और नियमानुसार वह सही था, लेकिन कई बार परिस्थिति अनुसार हमें अपना निर्णय बदलना भी पड़ता है। यदि किसी मरीज की जान पर बन आई हो और उस समय सारे कायदे-कानून लेकर बैठ जाएं तो मरीज के लिए गोल्डन hour निकल जाते हैं। यदि उस समय उसे जरूरी इलाज मिल जाए तो उसकी जान बच सकती है।
यह सिर्फ एक घटना नहीं है, यह सिस्टम का अमानवीय पक्ष है। इस घटना ने पुलिस सिस्टम की कई बड़ी कमियां उजागर की हैं। इस घटना से प्रशासन, जनता और पुलिस विभाग को भी सीखना होगा कि आपात स्थिति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
माना कि कानून की पालना सर्वोपरि है क्योंकि यदि कानून की पालना नहीं होगी तो अव्यवस्था फैल जाएगी। इसमें भी ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए ट्रैफिक नियमों की पालना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन ‘कानून पहले, इंसानियत बाद में’ वाली सोच को बदलने की जरूरत है। सामान्य स्थिति में कानून की पालना सर्वोपरि होनी चाहिए, लेकिन इस तरह की परिस्थितियों में जिसमें कानूनी कार्रवाई में लगने वाले समय के कारण किसी की जान जा सकती हो , तो ऐसी स्थिति में पुलिस को स्वविवेक से निर्णय लेना चाहिए और प्राथमिकता इंसानी जान बचाने को देनी चाहिए।
आपात स्थिति के लिए सरकार समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करती है, जिसमें कानूनी कार्रवाई से परे जाकर मरीज का इलाज पहले करें जिससे उसकी जान बचाई जा सके। लेकिन आज भी हमारा सिस्टम इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में अस्पताल एवं डॉक्टर पहले कानूनी कार्रवाई के लिए जोर डालते हैं जिससे कल को उन पर अथवा अस्पताल पर कोई आंच ना आए। इस अविश्वास की भावना को बदलना होगा। इसके लिए सरकार को कठोर दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए कि आपात स्थिति में मरीज का इलाज सर्वोपरि होना चाहिए, बाकी कागजी कार्रवाई बाद में भी की जा सकती है। तभी आपात स्थिति में मरीजों को सहायता मिल पाएगी। इस तरह के मामलों में कानून से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा, तभी पुलिस और आम जनता में विश्वास की भावना बढ़ेगी।
जमीन स्तर पर काम करने वाले पुलिस के सिपाही को भी जवाबदेही का भय रहता है। वह अपनी सीमाएं जानता है। उसे डर रहता है कि यदि गलती से उसने कानून की पालना नहीं कराई तो हो सकता है कि कहीं वह ड्यूटी में लापरवाही का शिकार ना हो जाए। इसके लिए पुलिस डिपार्टमेंट को ट्रेनिंग में ये सब बातें जोड़नी होंगी। साथ ही सरकार को भी यथासंभव कानून में बदलाव कर इन बातों को जोड़ना होगा, जिससे पुलिस भी पीड़ित की मदद कर सके।
जनता और पुलिस में आपसी विश्वास का अभाव कई केसों में देखा गया है, जिसमें बीमारी की आड़ में जुर्म हो जाता है। इसीलिए पुलिस विभाग हर केस को संदेह की दृष्टि से देखता है। इस मामले में भी पुलिस के सिपाही को लगा होगा कि चालान के डर के कारण ये लोग बहाने बना रहे हैं, क्योंकि पुलिस वालों का इस तरह के लोगों से वास्ता पड़ता रहता है। ऐसे में ‘हार की जीत’ कहानी ध्यान में आती है, जिसमें डाकू खड्ग सिंह एक भिखारी के भेष में बाबा भारती से मदद मांगता है और मदद की आड़ में बाबा भारती का घोड़ा चुरा ले जाता है। तब बाबा भारती डाकू खड्ग सिंह को यही कहते हैं कि इस घटना की चर्चा किसी से मत करना, नहीं तो लोगों का भिखारियों और गरीबों से विश्वास उठ जाएगा। आम जनता को भी इस संबंध में अपना नजरिया बदलने की जरूरत है, वो पुलिस को गुमराह करने का प्रयास न करें। तभी आम जनता और पुलिस में आपसी विश्वास कायम होगा, जिस से पुलिस की कार्य करने की क्षमता में भी सुधार होगा।
मैं पुलिस को गलत नहीं कह रहा। बिना नियम के सड़क जंगल बन जाएगी। हेलमेट, कागज, चालान – ये सब जरूरी हैं। पर सवाल ये है कि क्या नियमों की किताब में ‘इमरजेंसी’ नाम का एक पन्ना नहीं हो सकता? डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में फोन नहीं उठाता। पायलट टेकऑफ के बीच चाय नहीं पीता। तो क्या पुलिस इमरजेंसी में दो मिनट का ‘मानवीय विराम’ नहीं ले सकती?
ऐसा नहीं कि पुलिस के सिपाही समाज सेवा में पीछे रहते हैं, मैंने कई पुलिसवालों को देखा है – बाढ़ में कंधे पर बच्चे उठाते, एक्सीडेंट में खून देते, रात 2 बजे बुजुर्ग को घर छोड़ते। आखिर वर्दी के नीचे भी दिल धड़कता है, वो भी परिवार का महत्व समझते हैं।
टोंक की घटना के बाद सरकार को मेडिकल इमरजेंसी की SOP में एक लाइन और जोड़नी चाहिए कि “अगर सामने मेडिकल इमरजेंसी है, तो पहले अस्पताल, फिर कागज। फोटो ले लो, नंबर नोट कर लो, चालान बाद में कट जाएगा। जान वापस नहीं आएगी।” व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस विभाग की नहीं है, यह हम सबकी जिम्मेदारी है।
Pradeep Sharma
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