सुरों में सजी शांति गुरु की सात्विक भक्ती हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न

Vikram B Rathod
भायंदर पश्चिम में इंदिरा कॉम्प्लेक्स के पास स्थित श्री शांति गुरु मंदिर में गुरुवार, 24 सितंबर 2026 की रात्रि एक ऐसी सात्विक एवं भावपूर्ण श्री शांति गुरु भक्ति का आयोजन हुआ,जिसकी अनुभूति शब्दों में समेटना सहज नहीं। गायक एवं गीतकार परमार प्रकाश ‘आलोक’ के 72 वर्ष पूर्ण कर 73वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर आयोजित इस भक्ति संध्या में न कोई तड़क-भड़क थी,न आर्केस्ट्रा,न भारी-भरकम साज-सज्जा और न ही शोर-शराबा। अगर था तो केवल गुरु के प्रति समर्पित अंतरभाव,सधे हुए सुर और भक्ति में डूबे गुरुभक्तों के कंठ। मंदिर का प्रांगण गुरुभक्तों से इस कदर भर गया कि बैठने के लिए बाहर तक कुर्सियां लगानी पड़ीं।
रात्रि 8:30 से 10:30 बजे तक चली दो घंटे की धाराप्रवाह भक्ति में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति जैसे धीरे-धीरे बाहरी संसार से अलग होकर गुरु भक्ति के भावलोक में प्रवेश करता चला गया। सबसे विशेष बात यह रही कि यहां प्रस्तुति देने वाले सभी गुरुभक्त गायक-गायिकाएं थे,कोई पेशेवर कलाकार नहीं। साथ में केवल ढोलक और मंजीरा-और सादा-सा साउंड। लेकिन जब भाव सच्चे हों तो साधनों की आवश्यकता कहां रह जाती है! एक के बाद एक गुरुभक्त परेशजी कटारिया,मुनेशजी छाजेड़,अरविंदजी कोठारी,मितेश भाई,प्रकाशजी परमार,ललितजी भंडारी शोभा नाहर,भक्ति जैन इत्यादि ने अपने सुरीले कंठ से ऐसे भक्तिगीत प्रस्तुत किए कि पूरा वातावरण शांति,श्रद्धा और गुरु-समर्पण से सराबोर हो गया।

किसी ने मधुर स्वर में गुरु महिमा गाई,किसी ने चरणों में समर्पण के भाव उड़ेल दिए,तो किसी के गीत ने भीतर सोए श्रद्धा के भावों को जगा दिया। यह भक्ति कानों से सुनने से अधिक हृदय से अनुभव करने वाली थी। नान-स्टॉप भक्ति के दौरान वातावरण इतना भावमय रहा कि उपस्थित श्रद्धालु अंत तक अपने स्थान से उठना तक नहीं चाहते थे। यह आयोजन इस बात का सुंदर उदाहरण बना कि भक्ति की ऊंचाई साधनों की भव्यता से नहीं,भावों की गहराई से तय होती है। जब सुर में शुद्धता हो,शब्दों में श्रद्धा हो और हृदय में गुरु के प्रति समर्पण हो,तब साधारण ढोलक-मंजीरा भी दिव्य अनुभूति का माध्यम बन जाते हैं।
भक्ति के समापन पर लाभार्थी परमार प्रकाश ‘आलोक’ परिवार की ओर से पांच लकी ड्रॉ खोले गए तथा उपस्थित गुरुभक्तों में प्रभावना वितरित की गई। इस पावन गुरुभक्ति में मशहूर मंच सारथी भूषण ललित परमार की परिवार सहित विशेष उपस्थिति रही। पूरी भक्ति संध्या का आलम ऐसा था कि इसे केवल कार्यक्रम कहना शायद उचित नहीं होगा। यह गुरु चरणों में भावों की एक ऐसी सामूहिक अभिव्यक्ति थी,जिसमें हर सुर भीतर तक उतरता गया और हर गीत मन को शांति देता गया। न कोई दिखावा,न कोई शोर, बस गुरु नाम,सुर और भावों का जोर। परमार प्रकाश ‘आलोक’ के जन्मोत्सव का यह आयोजन उम्र के एक पड़ाव का उत्सव भर नहीं,बल्कि गुरु भक्ति के प्रति जीवनभर की आस्था को सुरों में अर्पित करने का एक सुंदर अवसर बन गया। सात्विक सुरों में जब गुरु भक्ति उतरती है, तो मंदिर का छोटा-सा प्रांगण भी भावनाओं का विराट आकाश बन जाता है।











