इच्छाएँ आकाश की तरह अनंत हैं : जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी

Vikram B Rathod
पिण्डवाड़ा, 2 सितंबर। सरस्वती नंदन जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. ने श्री प्रेमसूरि गुरु मंदिर आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि संसार में सभी दुःखों का कारण पाप है और सभी पापकर्मों का मुख्य कारण इच्छा है। मन में उत्पन्न होने वाली इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता। इच्छाएँ आकाश की तरह अनंत हैं।
उन्होंने कहा कि कुछ दूर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि आकाश और धरती एक स्थान पर मिल रहे हैं, लेकिन जब उस स्थान तक पहुंचते हैं तो उनका मिलन-बिंदु और दूर दिखाई देता है। कहीं भी चले जाएं, आकाश और धरती के मिलन का स्थान प्राप्त नहीं होता, क्योंकि आकाश अनंत है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य की इच्छाओं का भी कोई अंत नहीं है।
जैनाचार्य ने कहा कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है और इच्छाओं का यह सिलसिला निरंतर चलता रहता है। दुनिया इच्छा की पूर्ति में सुख की कल्पना करती है, जबकि वास्तविक सुख इच्छा की पूर्ति में नहीं, बल्कि इच्छा-मुक्ति में है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि निर्धन व्यक्ति सौ रुपये पाने की इच्छा रखता है। सौ रुपये मिलने के बाद हजार, फिर लाख, करोड़ और अरब रुपये पाने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात चिंतित रहता है, तन-तोड़ मेहनत करता है और कई बार न करने योग्य कार्यों के साथ विभिन्न प्रकार के पापाचार का भी सेवन करने लगता है।
उन्होंने कहा कि यदि इच्छा करनी ही है तो इच्छाओं से मुक्ति पाने की इच्छा करनी चाहिए। इच्छा-मुक्ति के लिए किया गया प्रयास निश्चित रूप से सफल होता है।
उन्होंने बताया कि 8 सितंबर से पर्युषण महापर्व का शुभारंभ होगा। इस दौरान धर्माराधना, आत्मचिंतन और संयम के माध्यम से मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाने का प्रयास करना चाहिए।











