अपने पावन पवित्र जीवन से आदर्श प्रस्तुत किया था जैनाचार्य श्री गुणरत्न सूरीश्वरजी ने

पिण्डवाड़ा
जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म. सा. की शुभ निश्रा में श्री प्रेमसूरि गुरु मंदिर – आराधना भवन पिण्डवाड़ा में 451 दीक्षा दानेश्वरी जैनाचार्य श्री गुणरत्न सूरीश्वरजी म. सा. की छठी पुण्यतिथि निमित्त गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ।
मंगलाचरण के बाद गुरुभक्त मनीष जैन, अशोकजी मरडिया एवं मेहुल भाई जैन ने स्वर्गस्थ गुरुदेवश्री के गुणानुवाद किया एवं गुरु भक्ति गीत प्रस्तुत किया।
धर्मसभा में प्रवचन देते हुए जैनाचार्य श्री ने कहा कि-
संसार में जन्म के बाद मरण होना निश्चित है। दुनिया मरण से घबराती है। शरीर और आत्मा के भेदज्ञान को समझकर जब मन परमात्म भक्ति में लीन बनकर और प्राणो का त्याग करे तो वह सर्वश्रेष्ठ समाधि मरण है।
जीवन में चाहे जितने तप, त्याग, व्रत पालन, दान आदि सत्कार्य किये हो, उन सभी की सच्ची सफलता समाधि मरण से ही प्राप्त होती है। कहा है – “मरणं मंगलं यस्य, सफलं जीवनं तस्य।

“राजस्थान की धरती के पादरली गांव में जन्में जैनाचार्य श्री गुणरत्न सूरीश्वरजी ने अपने पावन-पवित्र जीवन से समाधि मरण का आदर्श प्रस्तुत किया है।
आबू-अचलगढ़ तीर्थ पर ग्रीष्मकालीन शिविर के आयोजन करके उन्होंने बाल संस्करण का बीड़ा उठाया था। प्रेम और वात्सल्य के माध्यम से बालक एवं नौजवानों को संयम जीवन के लिए प्रेरित करते थे जिसके फलस्वरूप पिण्डवाड़ा में ही वि. सं. 2031 वें वर्ष में उनके हाथों से मुनिश्री मोक्षरत्न विजयश्री की दीक्षा हुई थी। उसके बाद लगभग 50 वर्षों में उनके हाथों से 451 दीक्षाएँ हुई है। पिण्डवाड़ा की भूमि पर उनके अत्यंत यशस्वी 6 चातुर्मास हुए थे।
गुरुकृपा के माध्यम से उन्होंने मात्र 6 वर्ष के संयम पर्याय में “खवग सेढी” ग्रंथ पर संस्कृत टीका की रचना की थी। उनके निर्मल संयम जीवन से संयम जीवन के अभिलाषी पुण्यात्माएँ उनके पास खींचे चले आते थे। तीर्थ यात्रा, उपधान तप, चातुर्मास आयोजन, तीर्थ प्रतिष्ठा आदि अनेक शासन प्रभावक कार्य उनकी शुभ निश्रा में खूब यशस्वी हुए है।”
प्रतिदिन प्रातः 09:45 बजे जैनाचार्य के प्रेरणादायी प्रवचन चालू हैं ।











