कई बाधाओं को पार कर शुरू हुआ इंडियन व्हिलेज, बच्चों का जीवन संवार रहे रवि बापटले

Jethmal Rathod
लातूर :- महाराष्ट्र के लातूर के पास एक बहुत ही खूबसूरत गांव है हॅप्पी इंडियन व्हिलेज। यह देश के दूसरे गांवों की तरह आम गांव ना होकर एक ऐसा स्थान है जहां सिर्फ और सिर्फ एचआयव्ही संक्रमित लोग रहते हैं।
ये वो लोग हैं जिन्हें इनके अपने लोगों ने दुत्कार दिया लेकिन रवि बापटले के लिए यही लोग उनकी पूरी दुनिया बन चुके हैं।जहां एचआयव्ही को साधारण लोग बहुत ही अछूत तरीके से देखते हैं वहीं रवि ने इसे हॅप्पी इंडियन व्हिलेज नाम देकर एचआयव्ही पीड़ितों को सम्मानजनक स्थान दिया है।
लातूर के पास उदगीर तालुका के धोंडिहिप्परगा गांव में जन्मे रवि बापटले की यह यात्रा भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है जितनी किसी एचआयव्ही पीड़ित की होती है,लेकिन जब इन्होंने अपने ही गांव में 2006 में एक एचआयव्ही पीड़ित बच्चे को अंतिम समय में संस्कार भी मुहैया होते हुए नहीं देखा, तो तभी रवि ने समाज से दुत्कारे गये इन लोगों के लिए कुछ करने की ठानी।
उस समय पेशे से एक मराठी अखबार के पत्रकार और प्रोफेसर रवि ने इस कार्य के लिए ना केवल अपनी नौकरी छोड़ी बल्कि शादी ना करने का निर्णय भी अपने माता-पिता को सुना दिया ताकि वह पूरी तरह से इन पीड़ितों के लिए समर्पित हो सकें। इनके कार्य को जानकर इनके दोस्त के रिश्तेदार ने इन्हें लातूर से 15 किमी दूर छह एकड़ जमीन दान दी।लेकिन चुनौतियां अभी शुरू होनी थीं। कारण गांव वालों ने रवि को समाज से बहिष्कृत कर दिया। उधर रवि के पास पैसा भी नहीं था तो इन्होंने स्कूल, कॉलेजों में जा जाकर पैसा मांगना शुरू किया। 2007 में जब इन्होंने दान से प्राप्त जमीन पर झोपड़ी बनाने का कार्य शुरू किया तो कुछ लोग इनकी झोपड़ी तोड़कर चले गये और गांव के सरपंच ने इन्हें बिजली पानी का कनेक्शन देने से भी मना कर दिया। लोगों को इनके इस कार्य से इस हद तक नफरत थी कि कुछ लोगों ने इनके विरोध में आंदोलन तक कर दिया।

एक के बाद एक बाधाओं के बाद भी रवि ने हार नहीं मानी और अपने मिशन को जारी रखा। शुरू में इनके पास चार पांच बच्चे थे जिन्हें सरकारी स्कूलों में एडमिशन कराने में बड़ी कठिनाई झेलनी पड़ी। आखिर रवि ने कहा कि अगर मेरे बच्चों की वजह से स्कूल के बच्चों को कुछ भी होता है तो मुझे सरेआम फांसी पर लटका दिया जाये। ऐसे विकट समय में इनके बड़े भाई और कुछ मित्रों ने खास सहयोग दिया आखिरकार इनके प्रयासों को बल मिला और यही कारण है कि आज सभी बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं वहीं कुछ बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी करने लगे हैं।
आज इनके इस सेवालय हैप्पी इंडियन विलेज में 110 लोग रह रहे हैं और अब तक लगभग 300 लोग यहां से निकलकर जा चुके हैं। उनमें से 35 लड़कियों की रवि ने शादी करा दी है। रवि बताते हैं कि जिनकी शादियां हुई हैं उनको प्रेग्नेंसी के दौरान उचित इलाज दिये जाने के कारण उनके बच्चे पूरी तरह से एचआईवी नैगेटिव हैं और किसी तरह के संक्रमण का कोई खतरा नहीं है। इतना ही नहीं यहां से गयी महिलाएं डिलीवरी के लिए अपने एकमात्र हॅप्पी इंडियन व्हिलेज ही आना पसंद करती हैं।
आज इस सेवालय के सेवा कार्यों की गूंज हर जगह है। मराठी केबीसी से लेकर हिंदी कौन बनेगा करोड़पति तक इन्हें आमंत्रित किया गया है और सहायता राशि दी गयी है। भजन गायिका पद्मश्री अनुराधा पौडवाल ने भी यहां दस कमरे बनवाये हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे भगतसिंह कोश्यारी ने इन बच्चों की सहायता के लिए दस लाख दिया है।
बस रवि बापटले की कोशिश यही है कि आज के इस आधुनिक युग में इन बच्चों को भी वही प्यार और सम्मान मिले क्योंकि इसमें इन बच्चों का कोई दोष नहीं है। हालांकि रवि आर्मी में जाकर देश सेवा तो नहीं कर सके लेकिन समाज में अवांछित मान लिये गये इस वर्ग को अपनाने के लिए पूरी तरह समर्पित हैं।











