मनुष्य जन्म के समय का एक-एक क्षण कीमती है

Vikram B Rathod
प्रभावक प्रवचनकार जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वरजी म. सा. ने श्री प्रेमसूरीश्वरजी गुरु मंदिर-आराधना भवन में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि-
कोई व्यक्ति अपने गृहांगण में उगे हुए कल्पवृक्ष को उखाड़कर बबूल का वृक्ष बोता है, या कोई व्यक्ति चिन्तामणि रत्न को फेंक-कर कांच के टुकड़े का संग्रह करता है, या कोई व्यक्ति लक्षण युक्त ऐरावत हाथी को बेच-कर गधा खरीदता है, उसे लोग मूर्ख और महामूर्ख ही कहते है ।
उसी तरह शाश्वत मोक्ष सुख को देने में समर्थ ऐसी सामग्री प्राप्त कर जो मनुष्य मात्र शारीरिक सुख के पीछे अथवा अर्थार्जन के पीछे व्यर्थ गंवा देता है वह मनुष्य भी ज्ञानी भगवंतों की नजर में मूर्ख ही है।
चार गति में परिभ्रमण करते हुए जीवात्मा को मनुष्य जन्म की प्राप्ति अतिदुर्लभ है। मोक्ष और परलोक की साधना मनुष्य जन्म में ही संभवित है। धर्माराधना के माध्यम से कर्मों की निर्जरा और पुण्य का अर्जन मात्र में कर सकता है वह अन्य गति के जीव अपने पूरे जीवन में नहीं कर सकते है।

पैसा, मानव जीवन का साधन है, उसे साध्य नहीं बनाना चाहिए। आज अधिकांश लोगों के जीवन का पैसा साध्य दिखता है। गृहस्थ जीवन में अर्थार्जन का निषेध नहीं है परंतु कब तक और कितना उसकी मर्यादा भी जरूरी है। सद्गृहस्थ तभी तक अर्थार्जन करे जब तक स्वयं और स्वयं के आश्रितजनों का निर्वाह नहीं होता हो।
मानव जीवन की एक-एक क्षण अति कीमती है। मृत्यु कभी भी आ सकती है। अतः पुण्य की कमाई के लिए प्रयत्नशील बनना चाहिए।
दि. 17 अगस्त को प्रातः 9:30 बजे नेमिनाथ प्रभु के जनकल्याणक निमित्त श्री गिरनार महातीर्थ भावयात्रा एवं पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम होगा।











