रेरा के दस साल बाद भी सवाल कायम: मीरा-भाईंदर में कारपेट एरिया की जगह “सुपर बिल्ट-अप” का खेल कब रुकेगा?

जेठमल
रेरा कानून लागू हुए लगभग एक दशक बीत चुका है, जिसका मूल उद्देश्य रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाना और घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना था।
इसके बावजूद मीरा-भाईंदर में आज भी अधिकतर बिल्डर फ्लैटों का मूल्य निर्धारण कारपेट एरिया के बजाय सुपर बिल्ट-अप, बिल्ट-अप अथवा केवल “वन रूम”, “टू रूम” और “थ्री रूम” जैसी श्रेणियों के आधार पर करते दिखाई देते हैं। यदि ऐसा रेरा के प्रावधानों के विपरीत हो रहा है, तो इससे खरीदारों को वास्तविक क्षेत्रफल की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती और वे लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान झेल सकते हैं। साथ ही राजस्व हानि की आशंका भी गंभीर जांच का विषय बनती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे मामलों पर नगर रचना विभाग सहित मनपा और रेरा ऑथरिटी की सक्रियता भी अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देती। यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो नियामक एजेंसियों का दायित्व केवल अनुमति देने तक सीमित नहीं, बल्कि प्रभावी निगरानी और समयबद्ध कार्रवाई करना भी है। वहीं स्थानीय राजनीति की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। यह धारणा बनना कि प्रभावशाली वर्गों के व्यावसायिक हितों के कारण इस मुद्दे को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनविश्वास—दोनों के लिए चिंताजनक है। ऐसी धारणाओं को दूर करने का एकमात्र रास्ता पारदर्शी जांच और निष्पक्ष कार्रवाई है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि रेरा ने घर खरीदारों को अपने अधिकारों के प्रति पहले से अधिक जागरूक बनाया है और शिकायत के प्रभावी कानूनी मंच उपलब्ध कराए हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि मीरा-भाईंदर में रेरा के प्रावधानों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाए, कारपेट एरिया आधारित बिक्री को सख्ती से लागू कराया जाए तथा नियमों के उल्लंघन पर बिना किसी दबाव या भेदभाव के कार्रवाई हो। रियल एस्टेट बाजार में विश्वास तभी मजबूत होगा जब खरीदार को पारदर्शिता मिले, सरकार को पूरा राजस्व मिले और कानून सभी पर समान रूप से लागू होता दिखाई दे।











