जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी द्वारा आलिखित 275वीं पुस्तक का हुआ भव्य विमोचन

Vikram B Rathod
- स्थान – मुण्डारा
- दिनांक: 23/06/2026
सरस्वती नंदन जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. के संयम सुवर्ण वर्ष की अनुमोदनार्थ श्री शांतिनाथ श्वेताम्बर मू. जैन संघ, मुंडारा के तत्वावधान में संयम संवेदना एवं 275वीं पुस्तक विमोचन निमित्त भक्ति संगीत एवं संवेदना का भव्य कार्यक्रम हुआ।
मंगलाचरण के बाद विमलभाई पोरवाल, प्रवीणभाई मेहता, अमीनभाई जोधावत, कल्पेशभाई मंडलेशा
आदि ने दीपक प्रज्वलन करके गुरुदेव पू. आ. श्री रामचन्द्र सूरीश्वरजी एवं पू. प. श्री भद्रंकर विजयजी म.सा. की तस्वीरों पर माल्यार्पण किया।
फिर सभा संचालक चेतनभाई मेहता ने जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वरजी का जीवन परिचय देकर संवेदना प्रस्तुत की।
संगीतकार पवन भाई ने भाववाही मधुर प्रस्तुत किया। मुनि श्री शालिभद्र विजयजी ने जैनाचार्य श्री के वैराग्य एवं संयम प्राप्ति के प्रसंगों का वर्णन किया। मुनि श्री स्थुलभद्र विजयजी ने जैनाचार्यश्री का साहित्य परिचय दिया। बालमुनि श्री विमलपपुन्य विजयजी ने जैनाचार्यश्री द्वारा आलिखित 275 पुस्तकों के क्रमशः नामोल्लेख करके सभा को आश्चर्यचकित किया।


फिर जैन हिन्दी साहित्य दिवाकर जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म.सा. द्वारा आलिखित 275वीं पुस्तक- “आओ! भाव सामायिक करे !का भव्य विमोचन -प्रवीणभाई मेहता, भरतभाई फागणिया, अशोकभाई गुगलिया, रमेशभाई, हसमुखलालजी मेहता, अमीतभाई मण्डलेशा आदि ने किया।
श्री शांतिनाथ श्वेतांबर मु. जैन संघ, मुण्डारा की ओर से कार्यक्रम के लाभार्थी परिवार मातुश्री नेकीबाई अमरचंदजी मेहता एवं मातुश्री दरियाबेन मिश्रीमलजी मण्डलेशा परिवार का बहुमान किया गया।
धर्मसभा को प्रवचन देते हुए जैनाचार्यश्री ने कहा कि-
देवों को भी दुर्लभ ऐसा मानव जन्म प्राप्त होने के बाद जिसने अपने जीवन में सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान और सम्यग् चारित्र की आराधना की है, उसका जीवन ही सफल और सार्थक है। चारित्र की प्राप्ति मात्र मानव जीवन में ही हो सकती है। अतः अपने जीवन को धर्माराधना से सफल बनाना चाहिए।
दोपहर – 3:00 बजे शंखेश्वर जिनालय में वर्धमान शक्रस्तव महाभिषेक हुआ।
दिनांक – 24 जून को प्रातः 8:00 बजे तीन मंदिरों के शिखरों पर ध्वजारोहण कार्यक्रम होगा।











