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FIR से ‘फरार’ तक: क्या सुर्खियां अदालत से बड़ी हो गई?, जब कानून की किताब से पहले मीडिया फैसला सुनाने लगे…

जेठमल बी. राठौड़


किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एफआईआर केवल जांच की शुरुआत होती है, न्याय का अंतिम फैसला नहीं। लेकिन आज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जैसे ही किसी चर्चित व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है, अगले ही पल सुर्खियां गूंजने लगती हैं”आरोपी फरार है!” सवाल यह है कि क्या एफआईआर दर्ज होते ही कोई व्यक्ति कानून की नजर में फरार हो जाता है? या फिर यह शब्द मीडिया की जल्दबाजी और सनसनी का शिकार बन चुका है? वास्तव में “फरार” वह होता है जो कानून से बचने के लिए जानबूझकर छिपे, पुलिस और अदालत की प्रक्रिया से लगातार दूर भागे। लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक अधिकार के तहत अग्रिम जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहा है, तो उसे पहले ही “फरार” घोषित कर देना न्याय की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

WhatsApp Image 2026 07 18 at 5.48.04 PMभारतीय न्याय व्यवस्था प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और जमानत मांगने का अधिकार देती है। जमानत कोई अपराध की स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त एक कानूनी सुरक्षा है। अदालत यह तय करती है कि गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं। यदि आरोपी अदालत में उपस्थित होकर कानून का पालन कर रहा है, तो उसके लिए “फरार” शब्द का प्रयोग केवल इसलिए करना कि वह अभी गिरफ्तार नहीं हुआ, न केवल कानूनी दृष्टि से भ्रामक है बल्कि उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी सीधा प्रहार है। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति पुलिस के नोटिस, समन, वारंट और न्यायालय के आदेशों की लगातार अवहेलना करता है, तब उसे फरार कहना उचित है। इसलिए एफआईआर, गिरफ्तारी, फरारी और बेल ये चारों अलग-अलग कानूनी चरण हैं, जिन्हें एक ही तराजू में तौलना न्याय के साथ अन्याय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया टीआरपी नहीं, कानून की भाषा बोले। न्यायालय का फैसला आने से पहले किसी को अपराधी या फरार घोषित करने की होड़ लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करती है। पत्रकारिता का धर्म सूचना देना है, निर्णय सुनाना नहीं। पुलिस का काम जांच करना है और अदालत का काम न्याय करना। यदि सुर्खियां ही फैसला लिखने लगें तो अदालतों की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी? इसलिए हर नागरिक, हर पत्रकार और हर राजनीतिक दल को यह समझना होगा कि एफआईआर खबर हो सकती है, लेकिन न्याय नहीं; गिरफ्तारी प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन दोष सिद्धि नहीं; और बेल कानूनी अधिकार है, अपराध का प्रमाण नहीं। कानून का सम्मान तभी बचेगा जब सुर्खियां संविधान की मर्यादा का सम्मान करना सीखें

Khushal Luniya

Meet Khushal Luniya – A Young Tech Enthusiast, AI Operations Expert, Graphic Designer, and Desk Editor at Luniya Times News. Known for his Brilliance and Creativity, Khushal Luniya has already mastered HTML and CSS. His deep passion for Coding, Artificial Intelligence, and Design is driving him to create impactful Digital Experiences. With a unique blend of technical skill and artistic vision, Khushal Luniya is truly a rising star in the Tech and Media World.

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