शाश्वत सुख की प्राप्ति संयम ओर साधना के पथ पर चलकर ही संभव : युवाचार्य महेन्द्र ऋषि

जेठमल बी.राठौड़ भायंदर
भीलवाड़ा, प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, दया और अनुकंपा का भाव ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है। बाह्य आडंबर, धार्मिक वेशभूषा अथवा दिखावे से नहीं, बल्कि संवेदनशील अंतःकरण, पाप से भय और अहिंसा के प्रति सजग जीवन से सच्ची धार्मिकता प्रकट होती है। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख से द्रवित होता है, वही वास्तव में धर्म में स्थित है। यह विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी महाराज ने शनिवार को कांचीपुरम स्थित आदिनाथ भवन में तीन दिवसीय प्रवास के अंतिम दिन धर्मसभा में व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने जैन आगम में वर्णित चित्त मुनि और ब्रह्मदत्त के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्वजन्म की साधना से प्राप्त वैभव यदि आत्मकल्याण का साधन न बने तो वही बंधन का कारण बन जाता है। सांसारिक भोग क्षणिक आकर्षण अवश्य देते हैं, किन्तु वे आत्मिक ऊर्जा, पुण्य और आध्यात्मिक सामर्थ्य का निरंतर क्षय करते हैं। शाश्वत सुख की प्राप्ति संयम, साधना और वैराग्य के पथ पर चलकर ही संभव है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति तत्काल समस्त भोगों का त्याग करने में समर्थ नहीं होता, किंतु इतना अवश्य कर सकता है कि अपने जीवन को आर्य आचरण की दिशा में अग्रसर करे। आर्य वही है जिसके अंतर्मन में पाप के प्रति भय, जीवमात्र के प्रति करुणा और प्रत्येक कर्म के प्रति नैतिक सजगता विद्यमान हो। आवश्यकता सीमित करना तथा अनावश्यक हिंसा, अपव्यय और प्रमाद से बचना ही धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है।

युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि भगवान महावीर का जिनशासन अहिंसा और सर्वजीव अनुकंपा पर आधारित है। धर्म में स्थित वही व्यक्ति है, जिसके हृदय में प्रत्येक प्राणी के प्रति करुणा का भाव जागृत हो। धार्मिक वेश, पद अथवा प्रतिष्ठा किसी को धर्मात्मा नहीं बनाती, बल्कि करुणा, दया, क्षमा और जीवदया से आलोकित अंतःकरण ही सच्ची धार्मिकता का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि पाप का वास्तविक स्वरूप आत्मा पर अशुभ कर्मों का बंध है। चुगली, निंदा हिंसा, कपट तथा शास्त्रों में वर्णित अठारह पापस्थान उसी अशुभ कर्मबंध के प्रमुख कारण हैं। जो व्यक्ति पाप से भयभीत रहता है, वह सहज ही इन दुर्वृत्तियों से स्वयं को दूर रखकर आत्मशुद्धि की दिशा में अग्रसर होता है।
धर्मसभा के अंत में युवाचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से चातुर्मास मे अधिकाधिक धर्मआराधना, स्वाध्याय, तप एवं संयम से जुड़ने का आह्वान किया।
महासती सुप्रभाजी ने कहा कि मनुष्य जीवन दुर्लभ, अनित्य और क्षणभंगुर है। आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग केवल मानव जीवन में ही संभव है, इसलिए इस अमूल्य अवसर को धर्म, साधना और आत्मकल्याण में लगाना चाहिए।
शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि धर्मसभा के पश्चात युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी महाराज, हितमित भाषी हितेन्द्र ऋषिजी, मेवाड़ गौरव रविन्द्र मुनिजी, तपस्वी धवल ऋषिजी, नवदीक्षित महक ऋषिजी सहित संतवृंद का आदिनाथ भवन से बसंत विहार के लिए मंगल विहार हुआ। इस अवसर पर शहर के विभिन्न श्रीसंघों के पदाधिकारी, श्रावक-श्राविकाएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहे तथा जयघोष के साथ श्रद्धापूर्वक विहार में सहभागी बने। रविवार को युवाचार्यश्री पुराना आजाद नगर जैन स्थानक पधारेंगे, जहां उनका दो दिवसीय प्रवास एवं धर्मसभा आयोजित होगी।











