गुरुकृपा से शिष्य वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है जो गुरु के पास न हो

- पिंडवाड़ा
Vikram B Rathod
जैन हिन्दी साहित्य दिवाकर जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वरजी म. सा. ने श्री प्रेमसूरि गुरु मंदिर- आराधना भवन- पिंडवाड़ा में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि-
शिष्य के जीवन में जो कुछ भी श्रेष्ठता प्राप्त होती है उसका मूल गुरु कृपा ही है। गुरु कृपा से अज्ञानी शिष्य भी सर्वश्रेष्ठ विद्वान बन सकता है। ऐसी कोई सिद्धि नहीं है जो शिष्य को गुरुकृपा के माध्यम से प्राप्त न हो।
गुरुकृपा में इतना बल है कि जो सिद्धि स्वयं गुरु ने प्राप्त नहीं की हो वह गुरुकृपा से शिष्य प्राप्त कर सकता है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण भगवान महावीर स्वामी के प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी जी हैं। भगवान महावीर स्वामी के प्रति अत्यधिक विनय और समर्पण भाव के कारण श्री गौतमस्वामी के जीवन में ऐसी शक्ति प्राप्त की थी कि वे जिस पर वासक्षेप डालते थे, उसे केवलज्ञान प्राप्त हो जाता था। स्वयं केवलज्ञानी न होने पर भी वे अपने शिष्यों को केवलज्ञान का दान करते थे।
यदि शिष्य के जीवन में सर्वश्रेष्ठ विनय और समर्पण प्राप्त हो जाय तो ज्ञान पाने के लिए शिष्य को ज्यादा श्रम की आवश्यकता नहीं रहती है, वह शास्त्रों का बोध भी प्राप्त कर सकता है।
गुरु के पास से आशीर्वाद मांगने की चीज नहीं है। भीतर की प्रसन्नता के कारण उनके मुख से निकले हुए शब्द ही आशीर्वाद का काम करते है।जिस तरह व्यक्ति दिन में तीन बार भोजन लेता है, उसी तरह आत्मा की प्रगति के लिए शिष्य को दिन में तीन बार वंदन करना चाहिए। गुरु का नाम भी मंत्राक्षर समान है। उनके नाम का भी प्रतिदिन जाप करना चाहिए।
दि. 16 अगस्त से श्री नेमिनाथ प्रभुजी के जन्म और दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में अठ्ठम तप होगा एवं दि. 17 अगस्त को गिरनार की भवयात्रा एवं जैनाचार्यश्री द्वारा आलेखित 278 वीं पुस्तक का विमोचन होगा।











