अज्ञान के अंधकार को दूर करने का कार्य तीर्थंकर करते है

- पिण्डवाड़ा
Vikram B Rathod
जैनाचार्य श्री रत्नसेन सूरीश्वर जी म.सा.ने श्री प्रेमसूरि गुरु मंदिर पिण्डवाड़ा में आयोजित धर्म सभा में प्रवचन देते हुए कहा कि –
बाहर के अंधकार को दूर करने का कार्य सूर्य करता है जबकि आत्मा के भीतर रहे अज्ञान के अंधकार को दूर करने का कार्य तीर्थंकर करते हैं । केवल ज्ञान की प्राप्ति के बाद प्रतिदिन सुबह – शाम एक-एक प्रहर तक धर्म देशना देकर वे भव्य जीवों को ज्ञानामृत का पान कराते हैं ।
तीर्थंकरों के प्रभाव से तीन प्रकार की प्रकृतियों में बदलाव आता है।
1- प्रकृति मंडल – जिस स्थान पर तीर्थंकरों का विचरण होता है वहाँ का प्राकृतिक वातावरण अनुकूल बन जाता है ।एक साथ में छह ऋतु खिल उठती है। पवन भी अनुकूल बहता है। पक्षी भी तीर्थंकरों को प्रदक्षिणा देते हैं।वृक्ष भी तीर्थंकरों के प्रति नम्र हो जाते है।

2-जीव प्रकृति – तीर्थंकरों के समीप रहे जीवों के स्वभाव भी बदल जाते हैं । कामी व्यक्ति ब्रह्मचारी बनता है ,लोभी व्यक्ति दानवीर बनता है ,मायावी व्यक्ति सरल बनता है, क्रोधी व्यक्ति भी क्षमाशील बनता है। मात्र मनुष्य ही नहीं आजन्म वैरी पशु भी अपने वैर विरोध को छोड़ देते हैं ।समवसरण में सिंह और हिरण, सांप और नेवला आदि जीव भी निश्चिंत होकर पास-पास में बैठते हैं। हिंसक जीव परम अहिंसक बन जाता है।
3- कर्म- प्रकृति – तीर्थंकर के दायरे में रहे जीवों के कर्मों के फल भी बदल जाते हैं। परम दु:खी और रोगी व्यक्ति भी सुखी और निरोगी बन जाता है ।तीर्थंकरों को स्पर्श किया हुआ वायु भी जहाँ- जहाँ बहता है, वहाँ के रोग ,शोक,मारी,महामारी एवं सभी प्रकार की व्याधियाँ शांत हो जाती है ।सर्वोच्च पुण्य के स्वामी ऐसे तीर्थंकरों की जितनी अधिक भक्ति करते हैं उतनी ही हमारे कर्मों की निर्जरा एवं पुण्य का बंध होता है ।अतः उन्हे बारंबार नमस्कार करना हमारा परम कर्तव्य है ।
दिनांक – 9 अगस्त से परम समाधि साधक पूज्यपाद आचार्य देव श्रीमद् विजय रामचंद्र सूरीश्वर जी की 35 वीं पुण्यतिथि निमित्त त्रिदिवसिय जिनभक्ति महोत्सव होगा।











