ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी छत्रपति शिवाजी महाराज राज्याभिषेक दिवस
छत्रपति शिवाजी महाराज (हिंदवी स्वराज के जनक)

छत्रपति शिवाजी महाराज के जन्म के समय हिंदुस्थान मुगलों के अधीन था। हिंदू समाज मानसिक रूप से निराश था , राजनीतिक और आर्थिक रूप से मुग़लों की मेहरबानी पर आश्रित था। दिल्लीश्वरो ही जगदीश्वरो को अपनी किस्मत मानता था, अर्थात जो दिल्ली की गद्दी पर विराजमान है वो ही हमारा अन्नदाता है और जनता के मन में खालीपन था । मुग़ल सल्तनत अपने चरम पर थी और हिंदू समाज मुगलों के अत्याचार से पीड़ित था । चारों तरफ सामाजिक, धार्मिक माहौल पतन की ओर था । उसका मुख्य कारण था :-
हिंदुओं पर जजिया कर और धार्मिक भेदभाव
ऐसा कहा जाता है कि अकबर ने जजिया कर हटा दिया था लेकिन बाद में औरंगजेब ने हिंदुओं पर जजिया कर थोप दिया था । जजिया कर एक प्रकार का धार्मिक और सुरक्षा टैक्स होता है । जिसे इस्लामी राज्यों में गैर मुसलमानों से वसूला जाता था इस कर के बदले में मुस्लिम शासक गैर मुसलमानों के जीवन संपत्ति और उनके धर्म की रक्षा की गारंटी देते थे। मंदिर तोड़ने की घटनाएं हो रही थी, काशी मथुरा जैसे प्रमुख तीर्थ स्थान पर दमनकारी प्रभाव था ।
सांस्कृतिक दमन
राजकाज की भाषा फारसी को बना दिया गया था । सरकारी नौकरी अदालतीं कार्यवाही एवं सभी काम फारसी में होते थे । भारतीय भाषाओं को हिकारत की नजरों से देखा जाता था ।
आर्थिक शोषण
हिंदुओं पर भारी लगन लगाया जाता था। क्योंकि युद्ध के लिए लड़ने वाली मुगल फौज हेतु रसद सामग्री चाहिए होती थी, उसका खर्चा बहुत था, जो हिंदुओं से लगान के रूप में वसूला जाता था ।
तारणहार
इतिहास गवाह है जब भी कोई देश या समाज निराशा के भाव में जी रहा होता है तो कोई ना कोई कारण तारणहार जरूर आता है जो समाज और देश को निराशा के भाव से निकाल कर समुत्कर्ष पर ले जाता है जो अपनी संस्कृति और स्व के भाव को जाग्रत करता है। तभी कोई शिवाजी जन्म लेता है । शिवाजी ने इस खालीपन को भरा । उन्होंने हिंदवी स्वराज्य का विचार दिया, यानि अपना राजा, अपने लोगों द्वारा, अपने लोगों के लिए, अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए ।
शिवाजी का जन्म
इन विकट परिस्थितियों में 19 फरवरी 1630 को शाहजीराजे भोंसले और जीजाबाई को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है । जीजाबाई ने अपने पुत्र का नाम भगवान शिव के नाम पर शिवा रखा । जीजाबाई के पिता निजामशाही सेना में ऊँचे ओहदे पर थे । शिवाजी के पिता शाहजीराजे भोंसले कुशल रणनीतिकार और आदिलशाही सेना में प्रमुख सरदार थे, वह भी आदिलशाह के दरबार में हाजिरी बजाते थे, जिसके कारण जीजाबाई अपने आप को सहज नहीं पाती थी । उनकी इच्छा थी कि मेरा शिवा बड़ा होकर हिंदू समाज का उद्धार करेगा ।
माता जीजाबाई से प्राप्त संस्कार
जीजाबाई शिवाजी की मार्गदर्शक थी । उनका जीवन माता के सानिध्य में बीता। उनकी माता जीजाबाई ने मुगलों के आक्रमण और अत्याचारों को बहुत करीब से देखा था, इसलिए उनके मन में एक स्वतंत्र हिंदू साम्राज्य (स्वराज) स्थापित करने का संकल्प था। इसीलिए उन्होंने बचपन से ही शिवाजी को साहस, स्वाभिमान और स्व-संस्कृति की रक्षा के संस्कार भरे थे। उन्हें महापुरुषों के वीरता पूर्ण प्रसंग सुनाया करती थी। उन्होंने शिवाजी के मन में भी हिंदवी स्वराज की स्थापना का संकल्प जागृत किया था । जीजाबाई ने बचपन में जो संस्कार शिवा को दिए , उन्हीं के कारण वो आगे चलकर हिंदू समाज का संरक्षक छत्रपति शिवाजी महाराज बना।
इस छोटी सी घटना से हम यह जान सकते हैं कि माता जीजाबाई द्वारा दिए संस्कारों से बचपन में ही शिवाजी के मन में राष्ट्र प्रेम के बीज पड़ गए थे।
बाल शिवाजी द्वारा सुल्तान आदिलशाह के दरबार में झुकने से इंकार
बालक शिवा को उनके पिता शाहजीराजे भोंसले एक बार बीजापुर सुल्तान आदिलशाह के दरबार में लेकर जाते हैं, दरबार की परंपरा के अनुसार सुल्तान के सामने कमर तक झुक कर सलाम बजाना पड़ता था, जब शाहजीराजे भोंसले ने शिवा को सुल्तान को सिर झुकाकर अभिवादन करने के लिए कहा तो शिवा ने मना कर दिया । सुल्तान बहुत क्रोधित होता है, लेकिन पिता के बार-बार आग्रह के बावजूद शिवा सर झुका कर अभिवादन नहीं करता ।
जीजाबाई की पूजा में बाधक हरा झंडा
शिवाजी जब 8 बरस के थे तब एक दिन उनकी माता सूर्य को अर्घ्य दे रही होती है, तो माता के चेहरे की उदासी और चिंता देखकर शिवाजी मां से पूछते हैं, मां क्या बात है आज आप बहुत उदास हो तो माता जीजाबाई कहती है कि शिवा जब मैं सूर्य भगवान को अर्घ्य देती हूं तो मुगलों का हरा झंडा मेरे और भगवान सूर्य के बीच में आ जाता है। इन घटनाओं का बाल शिवा के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
गौ माता की कसाई से रक्षा
जब शिवा जी लगभग 12 वर्ष के थे, तब उन्होंने पुणे में एक कसाई को एक गाय को जबरन वध के लिए ले जाते देखा
था। बाल शिवाजी ने देखा कि कसाई गाय को डंडे से पीटकर और रस्सी से बेदर्दी से खींचकर ले जा रहा था, और आसपास खड़े लोग मुग़ल शासकों के डर से कुछ नहीं बोल रहे थे, तो उनका मन विचलित हो गया। शिवाजी ने तुरंत आगे बढ़कर कसाई को गाय छोड़ने की चेतावनी दी। कसाई द्वारा बात न मानने और दुर्व्यवहार करने पर, उन्होंने अपनी तलवार के एक ही वार से कसाई के हाथ में पकड़ी रस्सी नहीं काटी, वरन, कसाई का वह हाथ काट दिया जिससे वह गाय को खींच रहा था। इसके बाद उन्होंने गाय की रस्सी काटकर उसे आज़ाद कर दिया।
तानाजी मालसुरे जैसे साथी
शिवाजी का अपने सैनिकों और उनके परिवार के साथ पारवारिक और आत्मीय सम्बन्ध होते थे। अपने राज्य के विस्तार हेतु शिवाजी कोंडाना दुर्ग को जीतना चाहते थे । वह जानते थे कि यह कार्य तानाजी मालसुरे के अलावा कोई नहीं कर सकता । लेकिन तानाजी के पुत्र का विवाह तय हो जाता है घर में शादी की तैयारी जोरों पर होती है उधर शिवाजी तानाजी को कोंडाना दुर्ग जीतने के लिए कहते हैं । तानाजी अपने पुत्र के विवाह की परवाह नहीं करते और कोंडाना क़िले पर आक्रमण कर देते हैं और अपनी जान की परवाह किए बिना वीरता से लड़ते हुए दुर्ग जीत लेते हैं लेकिन वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं । तब शिवाजी कहते हैं “गढ़ आला, पण सिंह गेला” अर्थात गढ़ तो आया लेकिन सिंह चला गया । और इसी की याद में कोंडाना दुर्ग का नाम सिंहगढ़ रखते हैं।
अफजल खान का वध
1656 में आदिलशाह की मृत्यु हो जाती है । 1659 में आदिलशाह की विधवा बेगम ने अफजल खान को शिवाजी को मारने के लिए भेजा । अफजल खान क्रूरता से आगे बढ़ता है, वो शिवा जी को उकसाने वाली हरकतें करता है। आम जनता पर निर्मम अत्याचार करते हुए, शिवाजी की कुलदेवी तुलजा भवानी का मंदिर ध्वस्त कर देता है। अफजल खान शिवाजी से आमने सामने की लड़ाई लड़ना चाहता था। जिससे शिवाजी से खुले मैदान में सीधा युद्ध हो, लेकिन शिवाजी बहुत दूरदर्शी और नीतिवान थे। उन्होंने धैर्य रखा और अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार किया। शिवा जी जानते थे कि अफजल खां के मुकाबले उनकी सेना कम है, इसीलिए उन्होंने अफजल खान से सीधे मैदान में युद्ध उचित नहीं समझा, उन्होंने अफजल खान से संधि के बहाने अकेले मिलने की योजना बनाई । उनके साथियों ने इसमें उनकी जान को खतरा बताते हुए, इसका विरोध किया, लेकिन शिवाजी अपनी धुन के पक्के थे, उन्होंने अफजल खान को संदेश भेजा कि आपकी विशाल सेना के सामने मैं बहुत डर गया हूं और संधि करना चाहता हूं ।
अफजल खां बहुत प्रसन्न हुआ, उसे लगा उसकी मुराद पूरी हुई, शिकार खुद चल कर आ रहा है, उसने तुरंत अपनी सहमति दे दी, खुले मैदान में एक शिविर में निहत्थे मिलना तैय हुआ । अफजल खान कुटिल बुद्धि का था। वो और शिवाजी अकेले मिलते हैं । अफजल खान बहुत लंबा चौड़ा बलिष्ठ शरीर वाला था जबकि शिवाजी छोटे सामान्य कद के थे । अफजल खान शिवाजी को गले मिलने के बहाने अपनी बाहों में जकड़ लेता है और दूसरे हाथ से कपड़ों में छुपी कटार निकालकर शिवाजी की पीठ पर वार करता है, लेकिन शिवाजी बहुत ही तीव्र बुद्धि के धनी थे वो अफजल खान की कुटिलता को जानते थे, उन्होंने वस्त्रों के नीचे कवच पहन रखा था, इसलिए अफजल खान का वार असफल हो गया, लेकिन तभी शिवाजी ने अपने हाथ की उंगलियों में पहने हुए बागनख से अफजल खान के पेट को चीरते हुए उसकी अंतड़ियों को बाहर निकाल दिया और अफजल खां वहीं ढेर हो गया ।
शाहिस्ता खां पर हमला
इसी प्रकार औरंगजेब की सेना जब बीजापुर पर आक्रमण करती है तो शिवजी और औरंगजेब की सेना में भीषण युद्ध होता है शिवाजी की विजय होती है । इस प्रकार शिवाजी के बढ़ते राज्य एवं पराक्रम से क्रोधित होकर औरंगज़ेब 1660 में शाइस्ता खान को भेजता है शाइस्ता खां सवा लाख सैनिकों की सेना लेकर निकलता है । 1660 से 1663 तक 3 साल तक शिवाजी के राज्यों को रौंदता हुआ आगे बढ़ता है। दुर्ग पर दुर्ग जीतता चला जाता है। लेकिन शिवाजी धैर्य रख उचित अवसर का इंतजार करते हैं ।
एक रात जब शाइस्ता खां और उसकी सेना पड़ाव डालकर सो रही होती है, तभी शिवाजी मात्र 400 सैनिकों के साथ हमला बोल देता है । अचानक हुए हमले से शाइस्ता खां के खेमे में भगदड़ मच जाती है । शाइस्ता खां डर कर महिलाओं के शिविर में भाग जाता है, शिवाजी शाइस्ता खां पर प्रहार करते हैं लेकिन वह बचने का प्रयास करता है, उसकी उंगलियां कट जाती है और शाइस्ता खां वहां से किसी तरह भागने में सफल हो जाता है उस अचानक हुए हमले में शाइस्ता खां का पुत्र मारा जाता है । शिवाजी अपने 400 सैनिकों के साथ शाइस्ता खां की लगभग आधी सेना को काट देते हैं, जिससे औरंगजेब की छटपटाहट और बढ़ जाती है।
चरित्रवान जीवन
शिवाजी महाराज जब कल्याण पर आक्रमण करते हैं तो कल्याण का सुल्तान भाग खड़ा होता है । विजय के बाद उनके सैनिक किसी को पर्दा डालकर दरबार में प्रस्तुत करते हैं तो शिवाजी सैनिकों से पूछते हैं कि ये क्या है । तब सैनिक कहते हैं महाराज यह हमने युद्ध में जीता है , यह हम आपके लिए लाए हैं, तब शिवाजी आगे बढ़ते हैं और पर्दा हटाने के लिए बोलते हैं, वो सुल्तान की पुत्रवधु होती है, शिवा जी आगे बढ़कर उसके चरण स्पर्श करके प्रणाम करते हैं शिवाजी कहते हैं देवी काश मेरी माता भी आप जैसी सुंदर होती तो मैं भी उतना ही सुंदर होता । कल्याण के सुल्तान की पुत्रवधू को ससम्मान सुल्तान तक पहुंचा देते हैं ।
धार्मिक नीति
कई आधुनिक टीकाकारों ने शिवाजी की धार्मिक नीतियों को सहिष्णु माना है। हिंदू धर्म को प्रोत्साहित करते हुए, शिवाजी ने न केवल मुसलमानों को बिना उत्पीड़न के धर्म का पालन करने की अनुमति दी, बल्कि उनके मंत्रालयों को दान देकर उनका समर्थन भी किया। शिवाजी ने पड़ोसी मुस्लिम राज्यों के विस्तार को रोक दिया था, इस बात को ध्यान में रखते हुए उनके समकालीन कवि भूषण ने कहा था:
यदि शिवाजी न होते तो काशी अपनी संस्कृति खो देती, मथुरा मस्जिद में बदल जाता और सभी का खतना हो जाता।
इस प्रकार शिवाजी ने जिंदगी भर मुगलों से संघर्ष किया 711 ई से 800 वर्षों तक पराभूत रहे हिंदू समाज को अपने स्वाभिमान से युक्त किया। शिवाजी ने अपने राज्य विस्तार के साथ-साथ मातृशक्ति की रक्षा, शासन व्यवस्था को अच्छा किया तथा सामाजिक समरसता के लिए कार्य किया ।
छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, 6 जून 1674 को महाराष्ट्र के रायगढ़ के किले में होता है , इस अवसर पर उन्होंने ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की और ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की स्थापना को औपचारिक मान्यता दी। काशी के प्रसिद्ध विद्वान गागा भट्ट द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यह राज्याभिषेक संपन्न कराया गया था।
संघ स्थापना के समय देश की स्थिति
जिस तरह शिवाजी के समय हिंदू समाज आत्मशून्य, पतित पराभूत था । 1925 में संघ की स्थापना के समय भी हिंदू समाज आत्मशून्य, पतित पराभूत था। पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार जी ने 1925 में संघ स्थापना कर हिंदू समाज को पुनः संगठित करने का कार्य आरंभ किया ।
हिन्दू साम्राज्य दिवस
ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का दिवस है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस दिवस को ‘हिंदू साम्राज्य दिवसोत्सव’ के रूप में मनाता है जो इनके वर्ष भर में मनाये जाने वाले छः उत्सवों में से एक है।
वर्तमान सन्दर्भ
आज के संदर्भ में देखें तो स्थितियां आज भी बहुत अनुकूल नहीं है, देश में जाति, वर्ग भेद, छुआछूत के नाम पर हिंदू को हिंदू से लड़ाने का प्रयास चल रहा है, एक तरफ धर्म परिवर्तन करने वाली शक्तियां सक्रिय है तो दूसरी और जिहादी मानसिकता वालों ने देश में कई प्रकार के जिहाद जैसे लव जिहाद, जमीन जिहाद, वक्फ़ बोर्ड के नाम पर जमीन हथियाना, हिंदुओं को बदनाम करने के लिए भगवा आतंकवाद का नैरेटिव बनाया जा रहा है। लेकिन संगठित होकर हिंदू समाज सभी चुनौतियों से मुकाबला कर सकता है और यही आज की जरूरत है।
प्रदीप शर्मा
ब्लॉगर(आकाशवाणी, अजमेर से निजी सचिव के पद से सेवानिवृत्त)
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