संविधान को कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश हो रही है : प्रशांत भूषण

एफडीसीए की संगोष्ठी में न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर उठे सवाल
RajKamal Pareek
जयपुर, 31 अक्टूबर। फोरम फॉर डेमोक्रेसी एंड कम्युनल एमिटी (एफडीसीए) की ओर से शनिवार को पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर में ‘संविधान, सद्भाव और वर्तमान परिस्थितियां’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने देश की वर्तमान राजनीतिक एवं संवैधानिक परिस्थितियों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता, चुनावी प्रक्रिया और सामाजिक सद्भाव से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं।
कार्यक्रम का शुभारंभ एफडीसीए के पूर्व प्रदेश महासचिव डॉ. मुहम्मद इकबाल सिद्दीकी के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने समाज में अन्याय के प्रति बढ़ती चुप्पी पर चिंता जताते हुए कहा कि देश में सुनियोजित तरीके से सामाजिक अलगाव को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की मूल शक्ति उसकी विविधता और एकता में निहित है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में एकता के स्थान पर एकरूपता थोपने के प्रयास किए जा रहे हैं।
संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर उठाए सवाल
मुख्य वक्ता वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अपने संबोधन में आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार विभिन्न तरीकों से संविधान को कमजोर करने का प्रयास कर रही है, ताकि संविधान कागजों पर तो मौजूद रहे, लेकिन व्यवहार में प्रभावहीन हो जाए। उन्होंने कहा कि देश में सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है तथा कानून के शासन के स्थान पर बुलडोजर कार्रवाई और कथित पुलिस मुठभेड़ों जैसी कार्रवाइयों को प्रोत्साहन मिल रहा है। उनके अनुसार, समाज में पहले से मौजूद नफरत और कुंठा को भी उभारा जा रहा है।
भूषण ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेजियम व्यवस्था में हस्तक्षेप तथा न्यायाधीशों के विरुद्ध डोजियर तैयार किए जाने जैसी गतिविधियों के माध्यम से न्यायपालिका सहित विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों पर दबाव बनाया जा रहा है, ताकि वे या तो सत्ता पक्ष की इच्छा के अनुरूप कार्य करें अथवा महत्वपूर्ण मुद्दों पर मौन रहें।
संसद की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि विधायी प्रक्रिया में सार्थक बहस और चर्चा का स्थान लगातार कम होता जा रहा है। उनके अनुसार, अनेक विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के शोर-शराबे के बीच पारित कर दिए जाते हैं।
उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। आरोप लगाया कि सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) की कार्यक्षमता प्रभावित हुई है। उन्होंने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए एसआईआर और ईवीएम को चुनावी प्रक्रिया से जुड़े गंभीर चिंता के विषय बताया।
विपक्ष की भूमिका को कमजोर बताते हुए भूषण ने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए युवाओं और नागरिक समाज से बड़ी उम्मीदें हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि एनडीए के सहयोगी दलों और भाजपा के सांसदों में भी संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेही का बोध जागेगा तथा वे लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा में अपनी भूमिका निभाएंगे।
विविधता भारतीय संविधान की बुनियादी विशेषता : डॉ. इलियास
विशिष्ट वक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि विविधता में एकता भारतीय संविधान की विशिष्ट उपलब्धि है। संविधान निर्माताओं ने कानून के शासन के माध्यम से समता, न्याय और बंधुत्व पर आधारित व्यवस्था की परिकल्पना की थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक विभाजन को हतोत्साहित करना और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना था।

उन्होंने कहा कि कानून निर्माण की प्रक्रिया में नागरिक समाज की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। जनता की समस्याओं की अनदेखी से लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि एक ओर हिंदू राष्ट्र का विचार प्रस्तुत किया जा रहा है, तो दूसरी ओर आर्थिक नीतियों के माध्यम से पूंजीवादी हितों को बढ़ावा मिल रहा है।
डॉ. इलियास ने कहा कि भारत की विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना के विपरीत एकरूपता थोपने का प्रयास न केवल प्रकृति के विरुद्ध है, बल्कि देश की एकता और लोकतांत्रिक भविष्य के लिए भी नुकसानदेह है।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सवाई सिंह ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में सरकार के अनेक दावों और घोषणाओं पर सवाल उठ रहे हैं तथा आम जनता विभिन्न समस्याओं से जूझ रही है। उन्होंने देशवासियों से लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश को एक बार फिर स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक जनजागरण की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में एफडीसीए के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश टेकचंद राहुल, प्रदेश उपाध्यक्ष फादर विजय पॉल, डॉ. जॉन मैथ्यू, मोहम्मद नाजिमुद्दीन, प्रो. बी.एम. शर्मा, श्रीमती सुमित्रा चोपड़ा, हाफिज मंजूर अली, संदीप होशंगाबाद और एडवोकेट प्रेमकिशन शर्मा सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों एवं चिंतकों ने अपने विचार साझा किए।
इस अवसर पर मुजम्मिल रिजवी, अब्दुल लतीफ आर्को, वकार अहमद, धर्मवीर कटेवा, एस.जी. मोदानी, अब्दुल सलाम जौहर, वरिष्ठ पत्रकार सन्नी सेबेस्टियन, मीनाक्षी जैदी, एडवोकेट कलीम अहमद और एडवोकेट मुनाजिर इस्लाम सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन बसंत हरियाणा ने किया, जबकि पत्रकार अनिल यादव ने आभार व्यक्त किया।











